Saturday, 23 March 2019

संयुक्त परिवार का अर्थ और आधार

संयुक्त परिवार का अर्थ 


दोस्तों हम सभी को तो ये मालूम है की परिवार मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है। एक होते है एकल परिवार और दूसरे होते है संयुक्त।

जिस परिवार में विवाहित पति-पत्नी तथा उनके बच्चो के आलावा कोई और दूसरा व्यक्ति नहीं रहता उसी परिवार को एकल परिवार कहा जाता है।

लेकिन दोस्तों कुछ परिवार ऐसे भी होते है जहाँ विवाहित पति-पत्नी और उनके बच्चो के आलावा पति-पत्नी के माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची भी एक साथ रहते है।

ऐसे परिवारों को ही समाजशास्त्रीक भाषा में संयुक्त परिवार कहाँ जाता है।

दोस्तों संयुक्त परिवार बनने के लिए कुछ आधार बेहद ही जरूरी होते है; आईए इन आधारो जानते है।     

संयुक्त परिवार का अर्थ और आधार

Friday, 22 March 2019

सामाजिक परिवर्तन के कारण

सामाजिक परिवर्तन के कारण


सामाजिक परिवर्तन के तो बहुत सारे कारण है , हो सकता है हम इन सभी को गिन गिन के थक जाये। दोस्तों इस लेख में हम इन सभी कारणों को अध्ययन नहीं करेंगे बल्कि इसके कुछ अत्यंत ही महत्वपूर्ण कारणों को जानेंगे, जिन्होंने अति तेज गति से सामाजिक परिवर्तन प्रक्रिया को आगे बढ़ाके ले आया है।

आईए अब उनसे परिचित होने की कोसिस करते है।


1. आधुनिकीकरण : - आधुनिकीकरण एक ऐसी आंधी है जिसका विकाश 16 सदी के मध्यभाग से ही यूरोप में हुआ था। इसने दुनिआ के हर एक समाज को छुआ जिसके कारण दुनिआ की समाज व्यबस्था के बिभिन्न अंशो में बृहद परिवर्तन संघटित हुआ।

आधुनिकीकरण ने विश्व की राजनीती, अर्थनीति, धर्म, शिक्षा, प्राद्यौगिकी इन सभी दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन संघटित किआ। 

आज जो हम राजनीती गणतांत्रिक अधिकार को भोग कर रहे है, वो भी आधुनिकीकरण का ही देन है।
सामाजिक परिवर्तन के कारण

2. गणतंत्र का विकाश : - गणतंत्र वो एक राजनैतिक व्यबस्था है जिसमे देश जनता दुवारा, जनता के लिए और जनता का ही शासन चलता है। 

दोस्तों विश्व की राजनैतिक व्यबस्था में पहले की समय में (लगभग 17 वी सदी तक) राजतन्त्र का एकाधिपत्य था, वहाँ देश की सामान्य जनता का ना कोई अधिकार था और ना ही कोई स्वतंत्रता।

वे हमेशा ही राजा का आदेश अपने इच्छा और इच्छा के विपरीत जाकर भी पालन करते थे।

जबसे दुनिआ में आधुनिकीकरण के माध्यम से राजतन्त्र का पतन हुआ है और गणतंत्र प्रतिष्ठा हुआ है तबसे सामान्य नागरिको का अधिकार और स्वतंत्रता का विषय ही महत्वपूर्ण हो गया है।

अगर हम विश्व की आज के राजनैतिक व्यबस्था की बात करे तो आज ज्यादातर देश गणतंत्र में यकीन रखता है, जहाँ सामान्य जनता का अधिकार और स्वतंत्रता को कोई भी हानि नहीं कर सकता।

व्यक्ति स्वतंत्रता के कारण व्यक्ति प्रतिभा गणतंत्र में अधिक प्रकाशित होने लगते है, जो बिभिन्न अविष्कारों के माध्यम से समाज को आगे बढ़ाके ले जाते है। 

आज अमेरिका, ब्रिटैन जैसे गणतांत्रिक देशो तेज सामाजिक परिवर्तन के लिए ये कारक काफी हद तक जिम्मेदार है।

सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत

सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत


दोस्तों दुनिआ के प्रत्येक मानव समाज का मुख्य विशेषता ही है परिवर्तन। ये परिवर्तन तेज गति से भी हो सकता है और धीमी गति से भी हो सकता है, रैखिक प्रक्रिया में भी हो सकता है और चक्रीय प्रक्रिया में भी।  

दोस्तों इससे पहले की लेख में हमने जाना था की सामाजिक परिवर्तन का रैखिक सिद्धांत क्या है ? इस लेख में हम जानेंगे की सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत क्या है ? तो चलिए इस प्रश्न के उत्तर ढूंढ़ने के माध्यम से ही इस लेख को सुरु करते है।
सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत

सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत क्या है ?

दुनिआ के ज्यादातर समाजो में कुछ पद्धिति या प्रक्रिया ऐसा होता है जो कुछ समय तक समाज में प्रचलित तो रहते है लेकिन समय बीतने के साथ साथ वो पद्धिति भी समाज से लगभग गायब हो जाता है। 

दोस्तों ऐसे गायब हो सुके पद्धितिया कुछ समय तक उस समाज से बेर पालके चलते है।

लेकिन उस समय के बीतने बाद देखा जाता है की वो पद्धिति पुनः उस समाज में लौट आते है। दोस्तों ऐसे चक्रीय प्रक्रिया के माध्यम से लौट आए ऐसे सामाजिक परिवर्तन प्रक्रियाओं को ही सामाजिक परिवर्तन का चक्रीय सिद्धांत कहाँ जाता है।

उदाहरण के रूप में लोगो की वेषभूषाओ के क्षेत्र में ये परिवर्तन प्रक्रिया ज्यादातर देखा जाता है। चलिए आपको एक सरल उदाहरण के माध्यम से इसको समझने में मदद करते है।

Monday, 18 March 2019

सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धांत

सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धांत


दोस्तों सामाजिक परिवर्तन का रेखिक सिद्धांत क्या है ? आपके मनमे एहि प्रश्न है ना, तो चलिए इस प्रश्न का समाधान सूत्र ढूंढ़ने की कोसिस करते है।

इस रैखिक सिद्धांत के अनुसार समाज व्यबस्था का परिवर्तन प्रारंभिक या प्रार्थमिक अवस्था में ही आरम्भ होता है और ये परिवर्तन किसी एक विशेष दिशा में निरंतर चलता ही रहता है अर्थात ये अपना रस्ता कभी भी नहीं बदलता।
सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धांत

ऐसे निरंतर एक ही दिशा में परिवर्तन होते रहने के कारण इसको रेखिक सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है। रेखिक परिवर्तन की संकल्पना बाकिओ से काफी बड़ा होता है और इसी से बाकिओ का भी जनम होता है।

सरल भाषा में कहे तो ये एक सीधा रास्ता है जो अंतहीन रूप से चलता ही रहता है और जो बाकि रास्ते होते है (यानि चक्रीय परिवर्तन) वो सभी इसके शरीर से जन्म लेते है।

उदाहरण के रूप में : - मानव जाती का सोच आदिम स्तरों से आकर आज इस आधुनिक अवस्था में पंहुचा है। मानव के सोच का ये जो विवर्तन है वो निरंतर चलता ही रहा है और ऐसे चलता ही जायेगा। इसको हम रेखिक परिवर्तन कह सकते है।

रेखिक परिवर्तन के ऊपर अगस्त कोम्टे, विलियम रॉबर्ट्सन, हर्बर्ट स्पेंसर और कार्ल मार्क्स जैसे महान समाज दार्शनिको ने बहुत ही गंभीरता से अध्ययन किए थे और कई सारे सिद्धांत भी आगे रखे थे।

इस लेख में अगस्त कोम्टे के सिद्धांत को ही अच्छे से जानने की कोसिस करेंगे।

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