Sunday, 3 February 2019

ज़ाक देरिदा के विरचना सिद्धांत

ज़ाक देरिदा के विरचना सिद्धांत (Jacques Derrida Deconstruction Theory in Hindi)


आधुनिक समाजशास्त्रविदो में से अन्यतम महान फ्रेंच दार्शनिक ज़ाक देरिदा का जनम हुआ था सं 1930 में। उनको विशेष करके उनके विख्यात सिद्धांत विरचना के लिए जाना जाता है। उन्होंने इस सिद्धांत के जरिए रचनावाद सिद्धांत की कमीओ को आलोचना किआ था।

[उनके विख्यात ग्रन्थ "Structure, sign and play in the discourse of human sciences" में उन्होंने इस सिद्धांत को विस्तारित रूप से आलोचना किआ है]

तो इस लेख में ज़ाक देरिदा के विरचना सिद्धांत को जानने का प्रयास करते है।
Jacques Derrida Deconstruction Theory in Hindi


विरचना सिद्धांत: -  उनके अनुसार जब कोई लेखक किसी लेख को प्रकाशित करता है तथा कोई पाठक उनके दुवारा प्रकशित उस लेख को पढता है तो उस पाठक के लिए ये जरूरी नहीं होता की वो उसी बात को उस लेख से समझे, जिस बात को समझके लेखक ने उस लेख को लिखा तथा प्रकाशित किआ था।

दोस्तों आप अभी मेरा ये जो लेख पढ़ रहे है, इस लेख में ज़ाक देरिदा के सिद्धांत को मई लिख रहा हूँ, और मैंने इस लेख को लिखने के लिए पहले ही उनके सिद्धांत को पढ़ा है। लकिन दोस्तों एहि पर एक मुख्य बात आती है की मैंने जिस बात को समझके इस लेख को आपके सामने प्रकाशित किआ है, ये जरूरी नहीं की आप भी उसी बात को समझो, जो मैंने समझा था या मैंने यहां समझाया है। आप इस लेख को कुछ अलग तरीके से भी समझ सकते हो।

देरिदा ने इसी बात को गंभीरता से अध्ययन किआ है। उनके अनुसार ये बिलकुल भी जरूरी नहीं की किसी लेख का एक ही सार्वजनीन अर्थ हो। पाठक अनुसार ये भिन्न भिन्न हो सकता है।

देरिदा से पहले गठनवादीओ ने ये धारणा दिआ था की किसी चिह्न या लेख का एक ही सार्वजनीन अर्थ होता लकिन देरिदा ने उनके विरचणात्मक  सिद्धांत के जरिए इसको पूरी तरह से नाकारा है। 

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ज़ाक देरिदा के विरचना सिद्धांत की मुख्य विशेषता (Jacques Derrida Deconstruction Theory Characterstics in Hindi) 

1. पाठक अनुसार किसी लेख या किसी चिह्ना का अर्थ भिन्न भिन्न हो सकता है। इसका कोई भी सार्वजनीन अर्थ प्रदान करना असंभव है।

2. विरचना एक बहुत जटिल प्रक्रिया है क्योकि इसमें व्यक्ति के मन का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है।

3. इसमें लेखक का महत्व काफी कम होता है लकिन इसके बदले पाठक का महत्व ज्यादा होता है।

4. विरचना का सफल प्रयोग तभी संभव है जब लेखक पाठक के समीप उपस्थित ना हो। क्योकि अगर लेखक ही पाठक के पास उपस्थित होगा तो वे उसको लेख का अर्थ समझा ही देगा। जो उनके दृष्टिकोण से लिखा गया था।